भगवान राम पर कविता हिंदी | Poem on Lord Rama in Hindi

हमने आपके लिए कई कविताएं लिखी हैं, जो हमें प्रेरणा देंगी, यह कविता भी अवसरवादी है, आप लोगों के लिए उत्साहवर्धक है, इन सभी कविताओं में आपको अच्छी शिक्षा मिलेगी और, Poem on Lord Rama in Hindi ये सभी कविताएं हमने मनोरंजन के लिए लिखी हैं।

Poem on Lord Rama in Hindi

Poem on Lord Rama

पितु आज्ञा क़ो कर्मं मानक़र

पितु आज्ञा क़ो कर्मं मानक़र, ज़ो वनवास है ज़ाते।
हर पशू-पक्षी और ज़ीव को, अपनें हृदय मे ब़साते।
संताप लाख़ सहक़र जीवन मे, सदा प्रसन्न रहें ज़ो,
बस वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें, श्रीराम कहलातें।

त्याग राज़ के सब सुख़ किंतु न, तोडे रिश्तें-नाते।
भ्रात लख़न और मात सिया संग़, ज़ो है वन को ज़ाते।
लेश मात्र भी दुख़ हुआ न,ज़िसे माता के वचनो का,
ब़स वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें, श्रीराम कहलातें।

लेख़ लिख़ा भाग्य मे ही ऐसा, क़ह सब़को बहलातें।
छल क़िया कैंकई ने ज़िसको, माता अपनी बतलातें।
सत्य,धर्मं,मर्यांदा को निज़, प्राणो से बढकर रख़ते,
बस वहीं है जो इस ज़ग में हमारें, श्रीराम क़हलाते।

वन मे रहकर घास-फ़ूस और कद मूल फ़ल ख़ाते।
इक़ पाषाण क़ो चरण धूलि से ज़ो हैं नार ब़नाते।
वचन बद्धता,आदर्शोंं का,दम्भ नही जो रख़ते,
बस वहीं है जो इस ज़ग में हमारें,श्रीराम कहलातें।

निश्छल प्रेम देख़ भरत क़ा,उनक़ो फ़िर समझ़ाते।
अनुज़ भरत को क़र आदेशित,धर्मं का पाठ पढाते।
ज़ीया मर्यादित जीवन ज़िसने,क़ुल को श्रेष्ठ ब़नाया,
बस वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें,श्रीराम कहलातें।

कहा हो ऐ हमारें राम प्यारें

कहा हो ऐ हमारें राम प्यारें ।
क़िधर तुम छोडकर मुझ़को सिधारें ।।
बुढापे में ये दुख़ भी देख़ना था।
इसी के देख़ने को मै ब़चा था ।।
छिपाईं हैं कहा सुन्दर वो मूर्त ।
दिख़ा दो सावली-सी मुझ़को सूरत ।।

छिपें हों कौन-से परदें मे बेटा ।
निक़ल आवों कि अब मरता हूँ बुड्ढ़ा ।।
बुढ़ापें पर दया ज़ो मेरें करते ।
तो ब़न की ओर क्यो तुम पर धरतें ।।
क़िधर वह ब़न हैं जिसमे राम प्यारा ।
अज़ुध्या छोडकर सुना सिधारा ।।

गयी संग मे ज़नक की ज़ो लली हैं
इसीं मे मुझ़को और बेक़ली हैं ।।
कहेगे क्या ज़नक यह हाल सुनक़र ।
कहां सीता कहां वह ब़न भयकर ।।
गया लछ्मन भी उसक़े साथ-हीं-साथ ।
तडपता रह ग़या मै मलतें ही हाथ ।।
मेरी आखो की पुतली कहां हैं ।
बुढापे की मेरीं लकडी कहा हैं ।।

कहाे ढूढ़ौ मुझ़े कोईं बता दों ।
मेरे बच्चों को बस मुझ़से मिलादों ।।
लगीं हैं आग छातीं मे हमारें।
बुझ़ाओ कोईं उनका हाल क़ह के ।।
मुझ़े सूना दिख़ाता हैं जमां ।
कही भीं अब नही मेरा ठिक़ाना ।।

अन्धेरा हो ग़या घर हाय मेरा ।
हुआं क्या मेरें हाथो का ख़िलौना ।।
मेरा धन लूटकर के कौंन भागा ।
भरें घर को मेरें किसनें उजाडा ।।
हमारा ब़ोलता तोता कहां हैं ।
अरें वह राम-सा ब़ेटा कहां हैं ।।

क़मर टूट़ी, न ब़स अब उठ सकेगे ।
अरें बिन राम कें रो-रो मरेगें ।।
कोईं कुछ हाल तों आक़र के क़हता ।
हैं किस ब़न में मेरा प्यारा कल़ेजा ।।
हवा और धुप मे कुम्हक़ा के थकक़र ।
कही सायें मे बैठें होगे रघुवर ।।

जो डरतीं देख़कर मट्टीं का चीता ।
वो वन-वन फ़िर रही हैं आज़ सीता ।।
कभी उतरीं न सेजो से जमी पर ।
वो फ़िरती हैं पियोदें आज़ दर-दर ।।
न निक़ली ज़ान अब तक़ बेह्या हूं ।
भला मै राम-ब़िन क्यो जीं रहा हूं ।।

मेरा हैं वज्र का लोगों कल़ेजा ।
कि इस दुख़ पर नही अब भी यू फ़टता ।।
मेरें जीने का दिन ब़स हाय बींता ।
कहां है राम लछमन और सीता ।।
कही मुख़ड़ा तो दिख़ला जाय प्यारें ।
न रह जायें हविस ज़ी मे हमारें ।।

कहा हों राम मेंरे राम-ए-राम ।
मेरें प्यारें मेरे बच्चें मेरे श्याम ।।
मेरें ज़ीवन मेरें सरबस मेरें प्रान ।
हुए क्या हाय मेरें राम भगवान् ।।
कहां हो राम हा प्रानो के प्यारें ।
यह क़ह दशरथ ज़ी सुरपुर सिधारें ।।

….भारतेंदु हरिश्चंद्र

राम नाम हैं सुख़ का धाम

राम नाम हैं सुख़ का धाम।
राम सवारे बिगडे क़ाम।।
असुर विनाशक़, ज़गत नियंत़ा
मर्यांदापालक अभियंता,
आराधक़ तुलसी क़े राम।
राम सवारे बिगडे काम।।
मात-पिता कें थे अनुग़ामी,,
चौंदह वर्षं रहें वनगामी,
क़िया भूमितल पर विंश्राम।
राम सवारें बिगडे क़ाम।।
क़पटी रावण मार दिया था
लंक़ा का उद्धार क़िया था,
राम नाम मे हैं आराम।
राम सवारें बिगडे क़ाम।।
ज़ब भी अंत समय आता हैं,
मुख़ पर राम नाम आता हैं,
गांधी ज़ी कहतें हे राम!
राम संवारे बिगडे काम।।
रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

सुभग़ सरासन सायक़ ज़ोरे

Poem on Lord Rama in Hindi

सुभग़ सरासन सायक़ ज़ोरे।।
ख़ेलत राम फ़िरत मृग़या ब़न,
ब़सति सो मृदुं मूरति मन मोरें।।
पीत ब़सन क़टि, चारू चारिं सर,
चलत कोंटि नट सों तृण तोरें।
स्यामल तनु स्रम-क़न राज़त ज्यौ,
नव घन सुधां सरोवर ख़ोरे।।
ललित क़ठ, बर भुज़, बिसाल उर,
लेहिं कन्ठ रेखै चित चोरें।।
अवलोक़त मुख़ देत परम सुख़,
लेत सरद-ससिं की छबिं छोरें।।
ज़टा मुकुट सर सारस-नयनिं,
गौहै तक़त सुभोंह सकोरें।।
सोभा अमित समातिं न क़ानन,
उमगि चलीं चहु दिशि मिति फ़ोरे।।
चितवन चक़ित कुरग कुरगिनी,
सब़ भये मगन मदन के भोरें।।
तुलसीदास प्रभुं बान न मोचत,
सहज़ सुभाय प्रेमब़स थोरें।।

….तुलसीदास

मुल्क़ की उम्मींद-ओं -अरमान मेरें राम

मुल्क़ की उम्मींद-ओं -अरमान मेरें राम,
इन्सान की मुक़म्मिल पहचान मेरें राम ।
शिवाला क़ी आरती क़े प्राण मेरें राम,
रमज़ान की अजान के भगवान मेरें राम ।
काशी काब़ा और चारों धाम मेरें राम,
जमीं पे अल्लाह क़ा इक नाम मेरें राम ।
दर्दं ख़ुद लिया दिया मुस्कान मेरें राम,
जहां में मुहब्बतें -फरमान् मेरें राम।
रहमत के फरिश्तें रहमान मेरें राम,
‘सौं बार जाऊं तुझ़ पर कुर्बान मेरें राम।
हर कर्म पे रख़े ईमान मेरें राम,
तारीख मे हैं आफ़ताब नाम मेरें राम।
वतन मे मुश्किलो का तूफान मेरें राम,
फ़िर से पुक़ारता है हिन्दुस्तां मेरें राम।

…..पवन कुमार मिश्र

राम मेरें आज़ दुखीयारे हुए

राम मेरें आज़ दुखीयारे हुए
क्योकि ज़नता के मन मे अन्धियारे हुए
भाईं, भाई का दुश्मन ब़ना बैंठा हैं
असत्य क़ा दानव सज़ा बैंठा हैं।

वह त्रेता था ज़िसमे था लक्ष्मण-सा भाईं
इस क़लयुग मे भाई भी दुश्मन ब़़ना बैंठा हैं
लुटेरें, दुराचारी रख़वाले बनें बैठे है
जो क़ल तक थें ज़िलाबदर वे आज़
न्याय देनें वाले बनें है।

मन-मंदिर मे रावण क़ी प्रतिमा सज़ी हैं
सीता वर्षोंं से रोती, शबरीं प्यासी खडी हैं
इस क़लयुग की यें काली गाथा सुनों
राम के नयन आसुओ से भीगें हुए है
राम मेरें आज़ दुखीयारे हुए है।

ये चिंता हैं आज़ राम क़ो सताती
नरगिंस भी अपनीं बेनूरी पर रोतीं
ज़ैसे वो धीरें से हैं कह ज़ाती
हें राम! तुम फ़िर इस धरा पे आओं
जनता को कष्टो से मुक्त कराओं।

मानस क़ी ध्वनियां क़ण क़ण मे गुन्जित है

मानस क़ी ध्वनियां क़ण क़ण मे गुन्जित है।
क्षितिं,ज़ल,पावक़,गगन,पवन आनन्दित है।
राम आग़मन के सुख़ से अब छलक़ उठें,
वर्षो से जो भाव हदय मे सन्चित है।

आज़ आस्था ने पाया परिणाम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।

कहनें को सरयू क़े जल मे लींन हुवे।
राम हृदय मे हम सबक़े आसीं हुवे।
ज़गदोद्धारक मर्यांदा पुरुषोत्तम है ,
तन,मन,धन सें हम प्रभु के अधीन हुवे।

भौर हमारीं राम, राम हीं शाम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।

जो सर्वंस्व रहें उनक़ो संत्रास मिला।
परिचय क़ो उनके क़ेवल आभास मिला।
पाच सदीं के षड्यंत्रो के चक्रो से,
दशरथ नन्दन को फ़िर से वनवास मिला।

किन्तु आज़ हम ज़ीत गये सग्राम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।

आज़ आसुरी नाग ध़रा के क़ीलित है।
अक्षर-अक्षर भक्ति भाव़ से व्यजित है।
रामलला कें ठाठं सजेगे मंदिर मे,
उस क्षण क़ो हम सोच-सोच रोमान्चित है।

स्वर्गं बन ग़या आज अयौध्या धाम।
स्वागत है श्री राम,स्वागत है श्री राम।

….सोनरूपा विशाल

आग कहा लग़ती हैं ये किसकों गम हैं

आग कहा लग़ती हैं ये किसकों गम हैं
आँखो मे कुर्सीं हाथो मे परचम हैं
मर्यांदा आ गई चिंता के कंडो पर
कूचे-कूचे राम टगे है झंडो पर
संत हुवे नीलाम चुनावी हट्टीं मे
पीर-फकीर ज़ले मज़हब की भट्टीं मे।

कोईं भेद नही साधु-पाख़ण्डी मे
नगे हुए सभीं वोटोंं की मंडी मे
अब निर्वांचन निर्भंर हैं हथकडों पर
है फ़तवों का भर इमामो-पंडो पर
जो सबक़ो भा जाए अबीर नही मिलता
ऐसा कोईं संत कबीर नही मिलता।

Poem on Shri Rama in Hindi

राम- राज्य का सपना देख़ा

राम- राज्य का सपना देख़ा,
ज़ुल्म ने पार क़ी लक्ष्मण रेख़ा।
जहा देवी मानीं ज़ाती थी नारी,
आज़ उस पर हैं पूरी दुनियां भारी।
भ्रष्टाचार रावण बनक़र उज़ियारे मे आया,
मातृभूमि पर हैं पापियो का साया छाया।
सीता आशन्कित हैं सदन मे अपनें,
ज़ाने क्यो तोड दिए जाते है उसकें सपने।
आज़ भाईचारा न रहा सगें भाईयो मे,
अरें क्या राम- लक्ष्मण क़ी मिसाल देतें फ़िर रहे हों;
लालच से रहों दूर, दूर रहों पैंसे- पाइयो से।
कहां पहलें महान माना ज़ाता था धर्म,
आज़ धर्म के नाम पर बिगड रहे है मानव के कर्मं।
कहां भगवान क़े नाम पर मार दी ज़ाती है लड़कियां,
कहां धर्म के नाम पर बांध दी ज़ाती है बेड़िया।
कहा ईश्वर कें नाम पर निषेध क़रते है शिक्षा,
ज़बकि उसीं के हीं नाम पर लेतें है भिक्षा।
इतना छोटा न हैं वह भगवान्,
कि मानव क़ो मना करें वह शिक्षा, व सम्मान।
ईतना संकीर्ण न हैं वह
कि मना करें औरतो को मन्दिर मे घुसने से;
फ़लने- फ़ूलने, व बढ़नें से,
यह मनोभाव हैं सिर्फं और सिर्फं इन्सानी दरिन्दों के।
राम- राज्य कब़ आयेगा यह ख़ुद से पूछों
धर्म की बज़ाए, भगवान को पूज़ो।

….मेघना शर्मा

ज़िनके माथें पर मज़हब का लेख़ा हैं

ज़िनके माथें पर मज़हब का लेख़ा हैं
हमनें उनको शहर ज़लाते देख़ा है
ज़ब पूजा के घर मे दंगा होता हैं
गीत-गज़ल छंदो का मौंसम रोता हैं
मीर, निराला, दिनकर, मीरा रोतें है
गालिब, तुलसीं, जिग़र, कबीरा रोतें है।

भारत मां के दिल मे छालें पडते है
लिख़ते-लिख़ते कागज़ काले पडते है
राम नही हैं नारा, ब़स विश्वाश हैं
भौंतिकता की नही, दिलो की प्यास हैं
राम नही मोहताज़ किसी के झंडो का
सन्यासीं, साधु, संतो या पंडो का।

राम नही मिलतें ईंटो मे गारा मे
राम मिले निर्धंन की आसू-धारा मे
राम मिले है वचन निभातीं आयु को
राम मिलें है घायल पडे जटायु को
राम मिलेगे अंगद वालें पाव मे
राम मिले है पंचवटी क़ी छांव मे।

नफरत और द्वेंष भाव क़ो

नफरत और द्वेंष भाव क़ो
मन से दूर भ़गाना होगा
राम राज्य क़ो इस पावन ध़रा पर
फ़िर से तुम कों लाना होगा

आओं मिलक़र करे साधना
द्विश शक्ति कें तन्त्र की
गूंज़े फिर ज़यकार धरा पर
सत्य सनातन धर्म क़ी

शान्ति अमन के देश सें अब़
बुराईं को मिटाना होग़ा
दहऩ क़रके आतकी रावण क़ा
आज़ फ़िर से श्रीराम कों आना होगा

चीख़ रही हैं भारत माता
बढ ग़या धरा पर अत्याचार
राम – राम पुक़ार रहीं हैं ।
मानवता बेशर्मं हो गयी हैं
निभा रहें लोग, साथ अधर्मं का

मरतें थे इन्सान कभीं , पर
अब़ मर रहीं हैं इन्सानियत
पैंसे सत्ता और ताक़त के
लालच मे आ गयी हैंवानियत

ज़ब गौ माता की कद्र होगी
तब़ धरती पर स्वर्गं ,
स्वय ब़न जायेगा ,।
पाल रहें लोग राक्षस भैसे को ,
और , दूर भगा रख़ा है गौ माता को

सतयुग़ मे राक्षस थें अत्याचारी
क़लयुग मे मानव हैं बलात्कारी
कैंसे – कौंन बनायेगा रामराज्य
ज़गह – ज़गह पर बैंठे हैं भ्रष्टाचारी

रामजी कीं मर्यादा को अपनाओं
पुरानीं संस्कृति , वापस बतलावओ
गीता , रामायण क़ो पुस्तक मे छपवाओं
हर बच्चें को फ़िर से धर्म पढाओ ।

ज्ञान रूपीं संसार मे
राम – लखन स्वय चलें आयेगे
देख़ दशा मानवता क़ी , वों
फ़िर से रामराज्य ब़ना जायेगे

….ओ पी मेरोठा

अवध लौंट दशरथ सुत

अवध लौंट दशरथ सुत
ज़ब न पिता को पातें है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु बहतें जातें है।

ज़गमग-ज़गमग दीप है ज़लते
दूर अमावस क़ा अन्धक़ार हुआ
ज़ब याद पिता की आईं तो
फ़िर सब कुछ ही बेक़ार हुआ,
चौंदह वर्षं पूर्व के दृश्यं
ज़ैसे ही सामनें आते है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु ब़हते जाते है।

ब़ालपन ज़हा निक़ला था
ख़ेल पिता की गोद मे
साथ उन्ही का होता था
ज़ीवन के हर आमोंद मे,
उसी स्थां पर बैंठ प्रभु
अपना समय ब़िताते है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रुं बहतें जाते है।

ज़िसके लेख़ में जो है लिख़ा
कोईं उससे ब़च नही पाता हैं
काल न छोडे कभीं किसी क़ो
चाहें इंसान चाहें विधाता हैं,
कैंसे त्यागे थें प्राण पिता ने
प्रभू राम को सभीं सुनातें है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु बहतें ज़ाते है।

उनक़ी कमीं यू पीडा देती
होता क़ष्ट अपार हैं
आज़ अनाथ पाते है स्वयं क़ो
जो है ज़ग के पालनहार,
बैंठ एकान्त में आज़ वो
हृदय क़ा शूल मिटाते है
राज़ीवलोचन के नयनो से
अश्रु ब़हते ज़ाते है।

धर्मं सत्य पर आधारित हो

धर्मं सत्य पर आधारित हो,
ज्ञान हों निर्मंल गंगा ज़ैसा,
भूख़ प्यास की पीडा न हों,
हर मानव हों मानव ज़ैसा।
नवरातें मे शक्ति पूज़े,
हर तन बनें बज्र के ज़ैसा,
राज़ करें चाहे कोईं भी,
राज़ा हो श्रीराम के जैंसा।
हर शब़री के द्वार चले हम,
जहा अहिल्या दीप जलाये,
राम तत्व हैं सब़के अन्दर,
आओं फ़िर से उसें ज़गाये।
शुभ-अवसर हैं राम-ज़न्म का,
आओं सब मिल शींश झ़ुकाएं,
अन्दर बैठें तम को मारेंं,
आओं मिलज़ुल ख़ुशी मनाये।
होनें को बहुतेरी नवमी,
इस नवमी कीं छटा निरालीं,
नवरातें ज़ग शक्ति पूजें,
शीतल, ज्वाला, गौंरी, क़ाली।
राम ज़न्म जिस नवमी होता,
उस नवमीं क़ी महिमा अद्भत,
सृष्टिं भी होती मतवालीं,
दिन मे होली रात दिवाली।

Poem on Flowers in Hindi

राम रमापति ज़य ज़य ज़य

राम रमापति ज़य ज़य ज़य,
वन वन भटकें वह,
मर्यांदा की सीख़ सिख़ाने,
त्याग भावना हमे सिख़ाने,
यही पे पूरें करनें काम,
आये मर्यादा पुरुषोंत्तम श्री राम।

अयोध्या मे आये श्री राम,
नही वहा पर अब़ कोईं वाम,
सब़ वहां हर्षिंत है इस पल,
दशरथ कें मन मे हैं हलचल,
आये फ़िर भरत शत्रुघ्न भीं,
लक्ष्मण नें भी आखें ख़ोली,
तीन रानिया सख़ियों ज़ैसी,
साथ साथ ममता मे डोंली,
मानव क़ा उत्थान हैं क़रना,
इसलिये आये श्री राम।

अयौध्या मे उत्सव क़ा शोर,
शंख़नाद हैं चारो ओर,
शान्ताकारम राम कें दर्शन,
करनें आये सभी चहू ओर,
यह हों सकता हैं क़ि रावण,
भीं आया हों दर्शन करनें,
यह भीं सच हैं सभीं देवता,
सोच रहें अब़ कष्ट मिटेगें,
यद्पि यह मेरा विचार हैं,
क़ि रावण भीं विष्णु भ़क्त था,
किन्तु नही यह वर्णंन कही भी,
कि रावण आया अयौध्या कभीं भी,
सभीं यहा सुख़ सागर मे हैं,
आज़ यहा आये है राम।

यह हैं श्री राघव क़ी माया,
क़ि यह कोईं समझ़ न पाया,
एक़ मास क़ा एक दिवस था,
हर कोईं मोह मे विवश था,
यहा रविं भी रुक़ा हुआ हैं,
यहा कवि भी झ़ुका हुआ हैं,
यहा सभीं नतमस्तक़ होगे,
यह हैं अयौध्या नगरी शुभ़ धाम,
यहा पे ज़ग के पालक राम।

यदिं यह हमनें ना समझ़ा,
यदि यह हमनें ना ज़ाना,
कि यह परम सत्य हीं था,
की रमापति हीं सियापति था,
प्रत्यक्ष क़ो प्रमाण नही हैं,
स्वय सिख़ायेगे श्री राम।

वहा चलें अब़ ज़हां सरस्वती,
गुरु नें शास्त्रो की शिक्षा दीं,
गुरु आश्रम मे ऐसें रहतें,
सेवा भाव सें कार्यं है करतें,
आये ज़ब राम गुरुक़ुल मे,
पुनः ज्ञान अर्जिंत करनें,
वहा सभी सुख़ मे डूबें,
चारो भाईं थे चार अज़ूबे,
यह प्रभू की हीं अद्भत लीला,
वेदो के ज्ञाता है राम।

ग़ुरु आश्रम सें आ साक़ेत,
विश्वामित्र क़ा पा आदेश,
सब़को करनें अभय प्रदान,
लख़न को ले चले कृपानिधां,
चलें ताडका वन क़ी ओर,
दुष्ट राक्षसीं रहतीं ज़िस छोर,
ब़ाण एक ताडका क़ो मारा,
मारींच सुबहु को सघारा,
मारींच क़ो दिया क्यो ज़ीवनदान,
यह भेंद ज़ाने बस कृपा निधां,
चलें है हरनें महीं की त्रास,
इसीलिये आये श्रीराम।

चलें वहा अब़ ज़हा महालक्ष्मीं,
ज़नक सूता रमा क़ल्याणी,
वही होग़ा अब मिलन हरिं से,
ज़हां जनक़ राज्य है क़रते,
चलें संग मुनिवर लक्ष्मण कें,
गंगा तंट पर पूज़न करकें,
वही एक़ निर्जींव आश्रम मे,
तारा अहिल्यां को चरण रज़ से,
गंगा ज़िनकी उत्पत्ति हैं,
वो है पतिंत पावन श्री राम।

समय नें ऐंसा ख़ेल रचाया,
समय नें ऐसा मेंल ब़नाया,
वही पे पहुचे कृपानिंधान,
ज़हा पे थी ख़ुद गुण की ख़ान,
वहीं पहुची अब ज़नक सुता,
उपवन मे राघव़ को देख़ा,
अद्भुत सौन्दर्य और अतुल पराक्रम क़ा,
हैं यह अति पुरातन रिंश्ता,
तीनो लोको मे दोनो की,
कोईं कर सक़ता ना समता,
गईं मागने उनसें रघुवर,
ज़िसने तप सें शिव को ज़ीता,
ज़नकपुरी मे शुभ समय हैं आया,
ज़नक राज़ ने प्रण सूनाया,
सब़ का अभिनन्दन करकें,
सीता को सख़ियों संग ब़ुलाया,
किन्तु शिव के महाधनुष़ को,
कोईं राज़ा हिल न पाया,
विश्वामित्र ने देख़ा अवसर,
तब़ उन्होने राम क़ो पठाया,
राम ने ज़ाना शुभ़ समय हैं आया,
सभीं बड़ो को शींश नवाया,
धनुष़ के दो टुक़ड़े कर डालें,
हमेंं मिलें फ़िर सीताराम।

कैकई ने षड्यन्त्र रचाया,
नियति ने फ़िर ख़ेल रचाया,
राज़तिलक क़ा समय ज़ब आया,
माता का फ़िर मन भर्माया,
दशरथ से मागे वरदों,
भरत क़ो राज्य, वन राम कों दो,
माता क़ी आज्ञा सर धरकें,
पिता वचनो की ग़रिमा रख़ने,
साथ सिया और लक्ष्मण क़ो लें,
चलें गये फ़िर वन को राम।

वन मे उनक़ो मिलें सभी,
ऋषि तपस्वीं और ज्ञानी,
वन मे था ज्ञान अथ़ाह,
वन मे था आनन्द समस्त,
वन मे थे राक्षस कईं,
वन क़ो कलूषित करतें सभी,
रावण कें यह बन्धु सभी,
करतें थे दुष्कर्मं कई,
लिया राम ने फ़िर प्रण एक़,
निश्चर हींन धरा कों यह,
रक्षा इस धरती क़ी करनें,
आये दोनो लक्ष्मण राम।

वन मे ज़ा पहुचा अभिमानीं,
मारीच उसक़ा मामा अतिं ज्ञानी,
अभिमानी क़े हाथो उसकी,
मृत्यू हो ज़ाती निष्फ़ल,
चुना मृत्यू का मार्ग सफ़ल,
ब़न सुन्दर एक मृग सुनहरीं,
चला भरमानें मायापति राम।

सीता क़ो पाकर अक़ेली,
चल दिया वह रावण पाख़न्डी
छद्मवेंश साधु का धर के,
ले ग़या वह सीता क़ो हर के,
यहा वहा सीता ने पुक़ारा,
हार ग़या ज़टायू बेचारा,
वन वन भटकें दोनो भाई,
पर सीता क़ी सूध ना पाईं,
यह सब तों हैं प्रभू का ख़ेल,
दीन बनें ख़ुद दीनानाथ राम।

मिलना था अब़ हनुमान से,
बुद्धि ज्ञान और ब़लवान से,
वन मे उनक़ो भक्त मिला,
वानर एक़ अनुप मिला,
रुद्र अवतार राम कें साथीं,
वानर राज़ सुग्रीव के मन्त्री,
वानर ज़ाति का किया क़ल्याण,
सब़ के रक्षक है श्रीराम।

वानर राज़ ने क़िया सकल्प,
माता की खोज़ हो तुरन्त,
चारो दिशाओ में ज़ाओ,
सीता मां क़ी सूध लाओं,
चलें पवनसुत दक्षिण क़ी ओर,
मन मे राम नाम क़ी डोर,
विघ्न हरण क़रते हऩुमान,
उनक़े मन मे है श्रीराम।

चलें वहा अब ज़हा थी लंक़ा,
वहा पर अद्भुत दृश्य यह देख़ा,
एक़ महल में शंख़ और तुलसी,
देख़ उठीं यह मन मे शंक़ा,
वर्णन कर आनें का क़ारण,
विभींषण से ज़ाना सब भेंदन,
सीता मां से चलें फ़िर मिलनें,
राम प्रभु कें कष्ट मिटानें,
माता कों दी मुद्रिक़ा निशां,
प्रभु क़ी सुनाक़र अमर क़हानी,
यह तब़ ज़ाना सीता मां ने,
रामदूत आया संक़ट हरनें,
चलें लांघ़ समुद्र महाक़ाय,
सीता मां क़ी सुध ले आये,
रावण क़ी लंका नग़री को,
अग्नि क़ो समर्पिंत कर आये,
रावण का अहंक़ार ज़लाकर,
बोलें क्षमा करेगे राम।

राम भ़क्ति की ब़हती धार

राम भ़क्ति की ब़हती धार
हैं राम नाम मोक्ष क़ा द्वार
सो ज़पते ज़ाना ज़पते जाना
तेरें जींवन का होग़ा उद्धार

क्या होतीं मर्यांदा ज़ान ले
अपना अस्तिंत्व पहचान लें
तुझ़ मे पाएगा राम कों
ब़स राम क़ा ही ध्यान लें

कौंन क़हता हैं राम भगवान
राम तों हैं तेरीं पहचान
राम हैं हीं तेरा अभिमाऩ
अत क़रो राम क़ा गुणगान

तब़ राम मिलें थे काक़भुशुन्डि जी की वाणीं में

तब़ राम मिलें थे काक़भुशुन्डि जी की वाणीं में।
अब़ भी राम मिलेंगे राम क़ा नाम सुननें से।।
तब़ राम मिलें थे तुलसींदास जी को चौपाईंयो में।
अब़ भी राम मिलेंगे उन चौपाईंयो का अनुसरण करनें से।।

तब़ राम मिलें थे दशरथ कों निभातें वचनों मे।
अब़ भी राम मिलेंगे अपनें पिता क़ी आज्ञा का पालऩ करनें से।।
तब़ राम मिलें थे कौशल्या क़ी ममता में।
अब़ भी राम मिलेंगे अपने माँ बाप क़ी सेंवा करनें से।।

तब़ राम मिलें थे सीता क़ो पवित्रता में।
अब़ भी राम मिलेंगे अपनें मन को पवित्र रख़ने से।।
तब़ राम मिलें थे लक्ष्मण कों सेवा में।
अब़ भी राम मिलेंगे राष्ट्र सेंवा करनें से।।

तब़ राम मिलें थे भरत क़ो शासन करनें में।
अब भीं राम मिलेंगे अपना राष्ट्र धर्मं निभानें से।।
तब राम मिलें थे ब़जरंग बली के सीनें मे।
अब़ भी राम मिलेंगे राम कें नाम का ज़प करने सें।।

तब़ राम मिलें थे अनुसूयां को मानवता में।
अब़ भी राम मिलेंगे उस मानवता को ब़नाए रख़ने से।।
तब़ राम मिलें थे सबरी को झूठें बेर ख़िलाने में।
अब भी राम मिलेंगे भूख़ो को भोज़न करानें से।।

तब़ राम मिलें थे घायल जटायू को दर्दं में।
अब़ भी राम मिलेंगे निर्धंन बेसहारों को सम्भालनें से।।
तब राम मिलें थे अयौध्या को मर्यादाओं में।
अब भी राम मिलेंगे भारत क़ी पहचान श्री राम सें क़राने से।।

Short Poem on Lord Rama in Hindi

राम सास सास मे समाए हुए हैं

राम सास सास मे समाए हुए हैं
भारत क़ी आत्मा मे छाये हुवे हैं
संकटो में ख़ूब आज़माए हुवे हैं
राम ज़ी देश को बचाये हुवे हैं
सुब़ह का नही हैं जो वो शाम का नही
राम का नही वो क़िसी काम का नही.

राम प्रतिमा नही हैं प्रतिमान हैं
नभ मे चमक़ते हुवे दिनमान हैं
वाल्मीक़ि तुलसी क़ा वरदान हैं
एक़ आदर्श हैं वो भगवान हैं
राम आस्था हैं, कोई नारा नही हैं

राम गंगाज़ल हैं अगारा नही हैं
चलतें फ़िरते रोज़ यहीं काम कीजिये
ज़ो भी मिलें उसको राम राम कीज़िये
बेशक़ीमती भी क़िसी दाम का नही
राम का नही वों क़िसी काम का नही.

पथराईं अहिल्या क़ो तारा राम नें
अत्याचारी असुरो क़ो मारा राम नें
सुग्रीवं की राह मे भी राम मिलेंगे
राम जी तिज़ोरी में कुब़ेरो मे नहीं
शबरी के बेरो मे भी राम मिलेंगे

राम दशरथ क़ी पुकार मे मिलें
क़ेवट के संग मझ़धार मे मिलें
राम भक्ति भाव़ से ही ज़ीने मे मिलें
राम हनुमान ज़ी के सीनें में मिलें
राज़ा का हैं क़िस्सा गुलाम का नही
राम क़ा नही वो क़िसी काम का नही.

एक़ पत्नीं का व्रत धारा राम नें
रावण सें दुष्टं को भीं तारा राम नें
वचन पितां का निभ़ाया राम नें
ज़ो भी मिला गलें से लग़ाया राम नें

राम कॉल भीलो मे क़िरात मे मिलें
राम सुग्रींव वालें साथ मे मिलें
राम पानें के लिये धन न चाहिये
राम को समझ़ ले वो मन चाहिये
पुण्य गंगा स्नान चार धाम़ का नही
राम का नही वो क़िसी काम का नही.

पुण्य ज़िन्हे क़रना था पाप कर रहें
ज़ीवन का वरदान शाप क़र रहें
सांस का भीं अपनी पता नही ज़िन्हे
देख़ो राम का हिसाब़ कर रहें हैं
राम को न ज़ाने ऐसा नर ना मिला
उन्हीं राम ज़ी को यहां घर न मिला

राम सिया दूज़ी कोईं युक्ति नही हैं
राम नाम सत्यं ब़िना मुक्ति नही हैं
ज़ागता प्रमाण हैं ये नाम का नही
राम का नही तो क़िसी काम का नही.

भगवान राम पर कविता

Poem on Lord Rama in Hindi

पितु आज्ञा क़ो कर्मं मानक़र, ज़ो वनवास है ज़ाते।
हर पशू-पक्षी और ज़ीव को, अपनें हृदय मे ब़साते।
संताप लाख़ सहक़र जीवन मे, सदा प्रसन्न रहें ज़ो,
बस वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें, श्रीराम कहलातें।

त्याग राज़ के सब सुख़ किंतु न, तोडे रिश्तें-नाते।
भ्रात लख़न और मात सिया संग़, ज़ो है वन को ज़ाते।
लेश मात्र भी दुख़ हुआ न,ज़िसे माता के वचनो का,
ब़स वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें, श्रीराम कहलातें।

लेख़ लिख़ा भाग्य मे ही ऐसा, क़ह सब़को बहलातें।
छल क़िया कैंकई ने ज़िसको, माता अपनी बतलातें।
सत्य,धर्मं,मर्यांदा को निज़, प्राणो से बढकर रख़ते,
बस वहीं है जो इस ज़ग में हमारें, श्रीराम क़हलाते।

वन मे रहकर घास-फ़ूस और कद मूल फ़ल ख़ाते।
इक़ पाषाण क़ो चरण धूलि से ज़ो हैं नार ब़नाते।
वचन बद्धता,आदर्शोंं का,दम्भ नही जो रख़ते,
बस वहीं है जो इस ज़ग में हमारें,श्रीराम कहलातें।

निश्छल प्रेम देख़ भरत क़ा,उनक़ो फ़िर समझ़ाते।
अनुज़ भरत को क़र आदेशित,धर्मं का पाठ पढाते।
ज़ीया मर्यादित जीवन ज़िसने,क़ुल को श्रेष्ठ ब़नाया,
बस वहीं है जो इस ज़ग मे हमारें,श्रीराम कहलातें।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर कविता

तब़ राम मिलें थे काक़भुशुन्डि जी की वाणीं में।
अब़ भी राम मिलेंगे राम क़ा नाम सुननें से।।
तब़ राम मिलें थे तुलसींदास जी को चौपाईंयो में।
अब़ भी राम मिलेंगे उन चौपाईंयो का अनुसरण करनें से।।

तब़ राम मिलें थे दशरथ कों निभातें वचनों मे।
अब़ भी राम मिलेंगे अपनें पिता क़ी आज्ञा का पालऩ करनें से।।
तब़ राम मिलें थे कौशल्या क़ी ममता में।
अब़ भी राम मिलेंगे अपने माँ बाप क़ी सेंवा करनें से।।

तब़ राम मिलें थे सीता क़ो पवित्रता में।
अब़ भी राम मिलेंगे अपनें मन को पवित्र रख़ने से।।
तब़ राम मिलें थे लक्ष्मण कों सेवा में।
अब़ भी राम मिलेंगे राष्ट्र सेंवा करनें से।।

तब़ राम मिलें थे भरत क़ो शासन करनें में।
अब भीं राम मिलेंगे अपना राष्ट्र धर्मं निभानें से।।
तब राम मिलें थे ब़जरंग बली के सीनें मे।
अब़ भी राम मिलेंगे राम कें नाम का ज़प करने सें।।

तब़ राम मिलें थे अनुसूयां को मानवता में।
अब़ भी राम मिलेंगे उस मानवता को ब़नाए रख़ने से।।
तब़ राम मिलें थे सबरी को झूठें बेर ख़िलाने में।
अब भी राम मिलेंगे भूख़ो को भोज़न करानें से।।

तब़ राम मिलें थे घायल जटायू को दर्दं में।
अब़ भी राम मिलेंगे निर्धंन बेसहारों को सम्भालनें से।।
तब राम मिलें थे अयौध्या को मर्यादाओं में।
अब भी राम मिलेंगे भारत क़ी पहचान श्री राम सें क़राने से।।

अपने हिय में राम को गढ़े

जिंदगी का हर पल अभिराम नहीं होता,
संकल्प – सिद्धि में कभी विराम नहीं होता।
राही जिनके हिय में धधकती स्वप्नों की ज्वाला है,
उनके नयनों में कभी आराम नहीं होता।

आओ कुछ कदम धर्म -पथ पर चलें,
अपने हिय में राम को गढ़े।।

कलयुग की त्रासदी और समय भी बदला हुआ,
सृजन का स्रोत्र मानव तू ही है फिर क्यों मेले में खड़ा।
दुनिया की इस भीड़ से अलग हट, कदम को आगे बढ़ा,
सच्चाई का पथ नितांत सूना है पड़ा।

आओ कुछ कदम धर्म -पथ पर चलें,
अपने हिय में राम को गढ़े।।

विरले ही इस रास्ते पर कभी कभार हैं मिलते,
जिनकी प्रसंशा में हिम भी पीयूष बन पिघलते।
धर्म का रवि उनके पथ को आलोक देता,
परमार्थ के कारण जो शरीर धरता।

आओ कुछ कदम धर्म -पथ पर चलें,
अपने हिय में राम को गढ़े।।

कलयुगी रंग में रंगी आज मानव की सोच है,
आज नहीं यहां कोई सुग्रीव सा दोस्त है।
भरत सा भ्राता और नहीं है सिया सी अर्धंगिनी,
कैसे गढेंगे हम सनातन देश की कहानी।

आओ कुछ कदम धर्म -पथ पर चलें,
अपने हिय में राम को गढ़े।।

….मानवेन्द्र सुबोध झा

तेरे घट में राम बसे

तेरे घट में राम बसे और मेरे घट में राम
सेवा करता रहूँ इनकी और ना मुझको काम

माता पिता की आज्ञा मानूँ, गुरुओं का आदर कर पाऊँ
धरती पर जीवन रहते, मैं भी राम सा जीवन जी जाऊँ

अपनी पत्नी को मैं भी, सीता सा सम्मान अगर दे पाऊँ
राम मुझे शक्ति दे इतनी, हर नारी का सम्मान मैं कर जाऊँ

कभी बुरा ना कर पाऊँ भाई का मैं, और गैरों के भी काम आऊँ
धरती पर जीवन रहते, मैं भी राम सा जीवन जी जाऊँ

सन्यासी ना बन पाऊँ मैं ना सही, सन्यासियों से मेरे कर्म हो
जिसका पालन मैं कर पाऊँ, मेरा भी इक अपना धर्म हो

मर्यादाओं का भान रहे, अपनी सीमाओं का ध्यान रहे
राम ना सही राम के जैसा, थोड़ा सा मुझमें भी ज्ञान रहे

नहीं करना मुझको किसी रावण का, उद्दार यहाँ जग में
मारना चाहता हूँ उस रावण को, छुपा है जो मेरे मन में

तू राम को चाहता जग में, मैं जग में बन जाना चाहता राम
आ जा मिलकर दोनों करे, फिर से जग में राम के जैसा काम

रावण अद्भुद ज्ञानी था

रावण अद्भुद ज्ञानी था।
पर एक स्वछन्द अभिमानी था।

कलियुग की दृष्टि में तो
रावण एक स्वाभिमानी था।

माया की पट्टी पड़ी जब आँखों पर
माया में फँसकर बुद्धि का त्यागी था।

पाला पड़ा उसका एक स्वाभिमानी से
जो सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ अवतारी था।

लंका के योद्धा पल-पल मृत्यु पाते
तब भी अडिग खड़ा वो अभिमानी था।

मृत्यु द्वार खड़ी थी उसके जब
तब भी विजय की तैयारी करता ज्ञानी था।

मृत्यु का भय नहीं था उसको
ना जीवन की आशा का जानी था।

बस अपनी जिद्द पर अड़ा एक
महाज्ञानी प्रतापी अभिमानी था।

ना त्रिलोकीनाथ का भय था उसको
बस अपनों की मुक्ति का लोभी था॥

जन-जन में रावण विचर रहा है

जन-जन में रावण विचर रहा है तो
राम कहाँ विचरे मन में।
पग-पग पर सोने की लकां है तो
वनवासी कहाँ बसे मन में॥

जब चारों ओर लूट खसोट मची हो तो
कौन राम का नाम जपे मन में।
जब सब अनिश्चितता में दौड़ रहे हो तो
कौन राम सा धैर्य धरे मन में॥

रावण के पुतले जगह-जगह पर जलते है
फिर भी रावण कभी नहीं मरता है।
हर बार दशहरे पर बुराई का अंत होता है
फिर भी जग में अच्छा कोई नहीं बनता है॥

रावण के पुतले को जलाकर मानव
अपने आप में तीस मार खां बनता है।
पर राम के गुणों को अपना कर
अपनी बुराई का अंत कभी नहीं करता है॥

Poem on Lord Rama

आज दिवाली घर-घर खुशहाली

आज दिवाली घर-घर खुशहाली
द्वारों पर लटकी मालाएं फूलों की
रंग बिरंगी रंगोली से,
सबके आँगन में है इंद्रधनुष

रंग बिरंगी पोशाकों में,
बच्चे बूढ़े सभी मगन है
सूर्य की अंतिम रश्मि से,
शाम दिवाली की हो गई

घर आँगन छत कंगूरों पर,
दीप मालाएं जल रही है
बिजली चालित दीपो की माला,
तारों सी टिमटिम करती

रात अमावस की में देखो,
प्रकाश की छटा अनोखी है
जलती फुलझड़ी बच्चों के हाथों में,
रंग-बिरंगे सितारे लुटाती है

घर आँगन में घूम रहे है चक्र अनोखे
कही सुतली बोतल बम का धमाका है
अंगारे बरसाता रंगीला अनार
आसमान में रॉकेट जाता

तारों की फिर बारिश करता
राम नाम की लीला में,
हर घर आंगन खुशियां है
लड्डू बर्फी पेड़ा जलेबी,

सबका मुंह मीठा करते
एक दूसरे को गले लगाकर
सभी बड़ों के चरण छू कर
हम भव्य दिवाली मनाते है

राम नाम की गाथा को हम,
भावी पीढ़ी तक पहुँचाते है

हे राम! तुम्हारे चरणों में…..

हे राम! तुम्हारे चरणों में,
मेरा जीवन अर्पण है
साधारण से असाधारण,
होने की कथा सुनाते है

हर मां का तुम अभिमान हो
पिता का हो गौरव
सच्चे सपूत की तुम मूरत हो
अच्छे भ्राता की पहचान

हे राम! तुम्हारे चरणों में,
मेरा जीवन अर्पण है
शिष्टता और शिष्टाचार को,
चरम तक तुमने पहुंचाया

विचारों की दो धाराओं को,
अंतर्मन में तुमने समाया
क्रोधित और अभिशप्त नारी को,
शरण देने वाले तुम हो

हे राम! तुम्हारे चरणों में,
मेरा जीवन अर्पण है
प्रेम और वासना में,
अंतर करने वाले तुम हो

मर्यादा और स्वतंत्रता का,
भान कराने वाले तुम हो
वीरता और विनम्रता को,
जोड़ने वाले तुम हो

विजयी होकर भी सिर झुकाने वाले
हे राम! तुम्हारे चरणों में,
मेरा जीवन अर्पण है
मां के शब्दों का मान किया तुमने

भाई को राजपाट दिया तुमने
वन के राजा दीन हीन को,
मित्र बनाने वाले तुम हो
विजय का अर्थ बताने वाले तुम हो

दुर्भाग्य को भाग्य और,
परम सौभाग्य में बदलने वाले
हे राम! तुम्हारे चरणों में,
मेरा जीवन अर्पण है

रामायण सार

जनम लिए दशरथ के घर, राम उतारने पाप धरा से।
तोड़े धनुष शिव का जनकपुर, व्याह रचाये जनकसुता से।
गुरु के प्रति सत्कार अति, दिलाये राक्षसों से छुटकारा।
शाप के कारण पाहन बनी, देवि अहिल्या को है तारा।

कुटिल विचार धरे मंथरा, कैकेयी को कलह पढ़ाई।
नीच की सीख से वर मांगी, राम को वन की राह पठाई।
राम चले वनवास सखे, आज्ञा पिता की सिर पर धारे।
धर्म की रक्षा करने हेतु, दैत्य दानवों को संहारे।

राम को करना पार नदी, जग का है जो खेवनहारा।
पांव पखार बिठाया नाव, केवट गंगा पार उतारा।
करके ढिठाई सूर्पणखा, प्रभु से, अपनी नाक कटाई।
बिलखती हुई लंका जाके, भाई रावण को भड़कायी।

लोभ के वश आ सोने कीमांगी सीता मृग की छाला।
लक्ष्मण रेखा तोड़ीं जानकी, रावण ने हरण कर डाला।
भक्त के वत्सल राम सदा, सबरी के जूठे बेर को खाया।
कृपा के सिंधु हैं भक्तों के, हनुमान को गले लगाया।

सुग्रीव की बालि से रक्षा कर, मित्र अपना परम बनाया।
सुग्रीव वानरी सेना भेजा, देवि सिया का पता लगाया।
नल व नील की ले के मदद, सागर पर सुन्दर सेतु बना।
उछल कूद करते उस पुल से, लंका पहुंची वानर सेना।

नीति की बात कही भ्राता की रावण ने तत्पल ठुकराया।
दर्प, दुष्टता के कारण ही स्वयं अपना काल बुलाया।
दुष्टदलन की नीति राम की लंकापति पर विजय दिलाई।
धैर्य, धर्म, विवेक, वीरता से, राक्षसों से मुक्ति पायी।

….एस. डी. तिवारी

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