Hindi Poem for Class 9 | कक्षा 9 के लिए हिंदी कविता

Through this poem, we give a message to the children that Hindi language is very important for them and they should understand and learn it. Apart from this, through this poem, we also teach children about the ideals that a good boy or girl should have. Hindi Poem for Class 9 this poem tells them about good behavior, manners, understanding and healthy state of mind both in their school and at home. In short, this poem enables children to move forward in their lives with a full cultural experience.

Hindi Poem for Class 9

Hindi Poem for Class 9

Today we have brought before you a very beautiful Hindi poem, which has been made for children. This poem teaches children about values, ethics and good manners. Hindi Poem for Class 9 this poem is a part of our culture and heritage which we should always cherish. so let’s start the poem

Hindi Poems for Class 9 for Kids

1. कुछ अशआर

अपनी पहचान मिटाने को कहा जाता है
बस्तियाँ छोड़ के जाने को कहा जाता है

पत्तियाँ रोज़ गिरा जाती है ज़हरीली हवा
और हमें पेड़ लगाने को कहा जाता है

नए सफर का नया इंतज़ाम कह देंगे
हवा को धूप चरागों को शाम कह देंगे

किसी से हाथ भी छुपकर मिलाइए वर्ना
इसे भी मौलवी साहब हराम कह देंगे

सूरज सितारे चाँद मेरे साथ मेँ रहे
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे

शाख़ों से टूट जायें वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे

आंख में पानी रखो, होठों पे चिंगारी रखो
जिंदा रहना है तो, तरकीबें बहुत सारी रखो

ले तो आये शायरी बाज़ार में राहत मियां
क्या ज़रूरी है के लहजे को भी बाज़ारी रखो

कल तक दर दर फिरने वाले,
घर के अन्दर बैठे हैं

और बेचारे घर के मालिक,
दरवाज़े पर बैठे हैं

खुल जा सिम सिम याद है किसको,
कौन कहे और कौन सुने

गूंगे बाहर चीख रहे हैं,
बहरे अन्दर बैठे हैं

नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में
उजाले पाँव पटकने लगे हैं पानी में

अब इतनी सारी शबों का हिसाब कौन रखे,
बहुत सवाब कमाए गए जवानी में

हर एक लफ्ज़ का अंदाज़ बदल रखा है
आज से हमने तेरा नाम, ग़ज़ल रखा है

मैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दिया
मेरे कमरे में भी एक ताज महल रखा है

….राहत इन्दौरी

2. वसंत

Hindi Poems for Class 9

तू आता है फिर जाता है।
जीवन में पुलकित प्रणय सदृश,
यौवन की पहली कांति अकृश,

जैसी हो, वह तू पाता है,
हे वसंत क्यों तू आता है?
पिक अपनी कूक सुनाता है,
तू आता है फिर जाता है।

बस, खुले हृदय से करुण कथा,
बीती बातें कुछ मर्म व्यथा,
वह डाल-डाल पर जाता है,
फिर ताल-ताल पर गाता है।

मलयज मंथर गति आता है,
तू आता है फिर जाता है।
जीवन की सुख-दु:ख आशा सब,
पतझड़ हो पूर्ण हुई हैं अब,

विकसित रसाल मुस्काता है,
कर-किसलय हिला बुलाता है।
हे वसंत क्यों तू आता है?
तू आता है फिर जाता है।

….जयशंकर प्रसाद

3. कौन तम के पार

कौन तम के पार?—(रे, कह)
अखिल-पल के स्रोत, जल-जग,
गगन घन-घन-धार-(रे, कह)

गंध-व्याकुल-कूल-उर-सर,
लहर-कच कर कमल-मुख-पर
हर्ष-अलि हर स्पर्श-शर, सर,

गूँज बारंबार!—(रे, कह)
उदय में तम-भेद सुनयन,
अस्त-दल ढक पलक-कल तन,

निशा-प्रिय-उर-शयन सुख-धन
सार या कि असार?—(रे, कह)
बरसता आतप यथा जल

कलुष से कृत सुहृत कोमल,
अशिव उपलाकार मंगल,
द्रवित जल नीहार!—(रे, कह)

….सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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4. समर शेष है

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो
किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्नि के शर से
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूँ किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले!
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी शेष भारत में अंधियाला है।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट सा संसार।

वह संसार जहाँ पर पहुँची अब तक नहीं किरण है,
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर-वरण है।
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्तस्तल हिलता है,
माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज,
सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में?

समर शेष है यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा,
और नहीं तो तुझ पर पापिनि! महावज्र टूटेगा।

समर शेष है इस स्वराज को सत्य बनाना होगा।
जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुँचाना होगा।
धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अड़े हुए हैं,

कह दो उनसे झुके अगर तो जग में यश पाएँगे,
अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों -से बह जाएँगे।

समर शेष है जनगंगा को खुल कर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो।
पथरीली, ऊँची ज़मीन है? तो उसको तोडेंग़े।
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,
खंड-खंड हो गिरे विषमता की काली जंज़ीर।

समर शेष है, अभी मनुज-भक्षी हुँकार रहे हैं।
गाँधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है।

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।

तिमिरपुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचें ना!
सावधान, हो खड़ी देश भर में गांधी की सेना।
बलि देकर भी बली! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे!

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

….रामधारी सिंह दिनकर

Hindi Poems for Class 9 with Pictures

5. ग़ालिब

रात को अक्सर होता है,परवाने आकर,
टेबल लैम्प के गिर्द इकट्ठे हो जाते हैं

सुनते हैं,सर धुनते हैं
सुन के सब अश’आर गज़ल के

जब भी मैं दीवान-ए-ग़ालिब
खोल के पढ़ने बैठता हूँ

सुबह फिर दीवान के रौशन सफ़हों से
परवानों की राख उठानी पड़ती है .

….गुलज़ार

6. मधुमालती

मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!
किरण-कन तन पर गिराती,
शारदीया चंदिरा-सी;

कौन है, कर धन्य जो
मधुभार मुझ पर डालती?
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!

आ रही मेरे हृदय में;
ज्योति-सी, सूने निलय में!
कौन है, धर चरण जो—

स्मृति-दीप उर में बालती?
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!
वह मुझे उर से लगाती,

सुप्त पुलकों को जगाती;
कौन है, सुख मूर्च्छना जो—
सलज सहज सँभालती?

मेरे हृदय निकुँज की मधुमालती!
प्रतिपदा की शशिकला वह,
आ गई निस्सीम में बह!

कौन है, भव शून्य में जो—
नियति-प्रतिमा ढालती?
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!

….नरेंद्र शर्मा

7. तू शब्दों का दास रे जोगी

तू शब्दों का दास रे जोगी
तेरा कहाँ विश्वास रे जोगी

इक दिन विष का प्याला पी जा
फिर न लगेगी प्यास रे जोगी

ये सांसों का का बन्दी जीवन
किसको आया रास रे जोगी

विधवा हो गई सारी नगरी
कौन चला वनवास रे जोगी

पुर आई थी मन की नदिया
बह गए सब एहसास रे जोगी

इक पल के सुख की क्या क़ीमत
दुख हैं बारह मास रे जोगी

बस्ती पीछा कब छोड़ेगी
लाख धरे सन्यास रे जोगी

…राहत इन्दौरी

8. वसंत की प्रतीक्षा

परिश्रम करता हूँ अविराम,
बनाता हूँ क्यारी औ’ कुंज।
सींचता दृग-जल से सानंद,
खिलेगा कभी मल्लिका-पुंज।

न काँटों की है कुछ परवाह,
सजा रखता हूँ इन्हें सयत्न।
कभी तो होगा इनमें फूल,
सफल होगा यह कभी प्रयत्न।

कभी मधु राका देख इसे,
करेगी इठलाती मधुहास।
अचानक फूल खिल उठेंगे,
कुंज होगा मलयज-आवास।

नई कोंपल में से कोकिल,
कभी किलकारेगा सानंद।
एक क्षण बैठ हमारे पास,
पिला दोगे मदिरा-मकरंद।

मूक हो मतवाली ममता,
खिले फूलों से विश्व अनंत।
चेतना बने अधीर मिलंद,
आह वह आवे विमल वसंत।

….जयशंकर प्रसाद

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9. आज मुझसे दूर दुनिया

आज मुझसे दूर दुनिया!
भावनाओं से विनिर्मित,
कल्पनाओं से सुसज्जित,
कर चुकी मेरे हृदय का

स्वप्न चकनाचूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!
‘बात पिछली भूल जाओ,
दूसरी नगरी बसाओ’—

प्रेमियों के प्रति रही है,
हाय, कितनी क्रूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!
वह समझ मुझको न पाती,

और मेरा दिल जलाती,
है चिता की राख कर मैं
माँगती सिंदूर दुनिया!
आज मुझसे दूर दुनिया!

….हरिवंशराय बच्चन

Hindi Poem for Class 9 Competition

10. कलम, आज उनकी जय बोल

Hindi Poems for Class 9

जो अगणित लघु दीप हमारे
तुफानों में एक किनारे
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल

पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही लपट दिशाएं
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल

….रामधारी सिंह दिनकर

11. निवेदन

तेरा प्रेम हलाहल प्यारे,
अब तो सुख से पीते हैं।
विरह सुधा से बचे हुए हैं,
मरने को हम जीते हैं॥

दौड़-दौड़ कर थका हुआ है,
पड़ कर प्रेम-पिपासा में।
हृदय ख़ूब ही भटक चुका है,
मृग-मरीचिका आशा में॥

मेरे मरुमय जीवन के हे
सुधा-स्रोत! दिखला जाओ।
अपनी आँखों के आँसू से
इसको भी नहला जाओ॥

डरो नहीं, जो तुमको मेरा
उपालंभ सुनना होगा।
केवल एक तुम्हारा चुंबन
इस मुख को चुप कर देगा॥

….जयशंकर प्रसाद

12. निभाना ही कठिन है

प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

है बहुत आसान ठुकराना किसी को,
है न मुश्किल भूल भी जाना किसी को,
प्राण-दीपक बीच साँसों को हवा में

याद की बाती जलाना ही कठिन है
प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

स्वप्न बन क्षण भर किसी स्वप्निल नयन के,
ध्यान-मंदिर में किसी मीरा गगन के
देवता बनना नहीं मुश्किल, मगर सब—

भार पूजा का उठाना ही कठिन है।
प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

चीख-चिल्लाते सुनाते विश्व भर को,
पार कर लेते सभी बीहड़ डगर को,
विष-बुझे पर पंथ के कटु कंटकों की

हर चुभन पर मुस्कुराना ही कठिन है।
प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

छोड़ नैया वायु-धारा के सहारे,
है सभी ही सहज लग जाते किनारे,
धार के विपरीत लेकिन नाव खेकर

हर लहर को तट बनाना ही कठिन है।
प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

दूसरों के मग सुगम का अनुसरण कर
है बहुत आसान बढ़ना ध्येय पथ पर
पाँव के नीचे मगर मंज़िल बसाकर

विश्व को पीछे चलाना ही कठिन है।
प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

वक़्त के संग-संग बदल निज कंठ-लय-स्वर
क्या कठिन गाना सुनाना गीत नश्वर
पर विरोधों के भयानक शोर-गुल में

एक स्वर से गीत गाना ही कठिन है।
प्यार तो करना बहुत आसान प्रेयसी!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

….गोपालदास नीरज

13. कौन तुम मेरे हृदय में?

कौन तुम मेरे हृदय में?
कौन मेरी कसक में नित
मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में

घुमड़ घिर झरता अपरिचित?
स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा
नींद के सूने निलय में!
कौन तुम मेरे हृदय में?

अनुसरण नि:श्वास मेरे
कर रहे किसका निरंतर?
चूमने पदचिह्न किसके
लौटते यह श्वास फिर-फिर?

कौन बंदी कर मुझे अब
बँध गया अपनी विजय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?
एक करुण अभाव में चिर—

तृप्ति का संसार संचित;
एक लघु क्षण दे रहा
निर्वाण के वरदान शत-शत;
पा लिया मैंने किसे इस

वेदना के मधुर क्रय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?
गूँजता उर में न जाने
दूर के संगीत-सा क्या?

आज खो निज को मुझे
खोया मिला, विपरीत-सा क्या?
क्या नहा आई विरह-निशि
मिलन-मधु-दिन के उदय में?

कौन तुम मेरे हृदय में?
तिमिर-पारावार में
आलोक-प्रतिमा है अकंपित;
आज ज्वाला से बरसता

क्यों मधुर घनसार सुरभित?
सुन रही हूँ एक ही
झंकार जीवन में प्रलय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

मूक सुख-दुख कर रहे
मेरा नया शृंगार-सा क्या?
झूम गर्वित स्वर्ग देता—
नत धरा को प्यार-सा क्या?

आज पुलकित सृष्टि क्या
करने चली अभिसार लय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

….महादेवी वर्मा

14. हार न अपनी मानूँगा

हार न अपनी मानूँगा मैं!
चाहे पथ में शूल बिछाओ
चाहे ज्वालामुखी बसाओ,

किंतु मुझे जब जाना ही है—
तलवारों की धारों पर भी,
हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं!

मन में मरु-सी प्यास जगाओ,
रस की बूँद नहीं बरसाओ,
किंतु मुझे जब जीना ही है—

मसल-मसल कर उर के छाले,
अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं!
हार न अपनी मानूँगा मैं!

चाहे चिर गायन सो जाए,
और हृदय मुर्दा हो जाए,
किंतु मुझे अब जीना ही है—

बैठ चिता की छाती पर भी,
मादक गीत सुना लूँगा मैं!
हार न अपनी मानूँगा मैं!

….गोपालदास नीरज

Short Hindi Poems for Class 9

15. आँखों से अलख जगाने को

आँखों से अलख जगाने को,
यह आज भैरवी आई है।
उषा-सी आँखों में कितनी,

मादकता भरी ललाई है।
कहता दिगंत से मलय पवन
प्राची की लाज भरी चितवन

है रात घूम आई मधुबन,
यह आलस की अँगराई है।
लहरों में यह क्रीड़ा-चंचल,

सागर का उद्वेलित अंचल
है पोंछ रहा आँखें छलछल,
किसने यह चोट लगाई है?

….जयशंकर प्रसाद

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16. बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु

पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,

आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव, बंधु!
वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,

फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!

….सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

17. लहरों में हलचल होती है

कहीं न ऐसी आँधी आवे
जिससे दिवस रात हो जावे
यही सोचकर कोकी बैठी

तट पर निज धीरज खोती है।
लहरों में हलचल होती है।
लो, वह आई आँधी काली

तम-पथ पर भटकाने वाली
अभी गा रही थी जो कालिका
पड़ी भूमि पर वो सोती है।

लहरों में हलचल होती है।
चक्र-सदृश भीषण भँवरों में
औ’ पर्वताकार लहरों में

एकाकी नाविक की नौका
अब अंतिम चक्कर लेती है।
लहरों में हलचल होती है।

….गोपालदास नीरज

18. 15 अगस्त 1947

अन्न-वस्त्र-हीन दीन थी निरक्षरा,
भस्मसात् थी हिरण्यमयि वसुंधरा;
अप्रकेत शक्ति-सिंधु, सुप्त चेतना,

विकृति से विषाक्त थी विशद परंपरा!
किंतु अब तिमिरमयी निशा चली गई,
शापमुक्त, पापमुक्त, हो रही मही!

तिमिर-क्रोड़ फोड़ भानु भासमान रे—
नव विहान, नव निशान, भारती नई!
अब न जन रहें विपन्न, ग्रास त्रास के

नृत्य करें ओस पुष्प अश्रुहास के!
आज देश माँगता पवित्र एक वर,
दास फिर बनें न कभी पुत्र दास के!

….नरेंद्र शर्मा

19. मैं जीवन में कुछ कर न सका

Hindi Poems for Class 9

जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्वाला लेकर आया था,
मैंने जलकर दी आयु बिता,

पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ कर न सका!
अपनी ही आग बुझा लेता,

तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था,
लघु प्याला भी मैं भर न सका!

मैं जीवन में कुछ कर न सका!
बीता अवसर क्या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,

मरना तो होगा ही मुझको
जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ कर न सका!

….हरिवंशराय बच्चन

Hindi Poems for Class 9 Students

20. झरना

मधुर है स्रोत मधुर है लहरी
न है उत्पात, छटा है छहरी
मनोहर झरना।

कठिन गिरि कहाँ विदारित करना
बात कुछ छिपी हुई है गहरी
मधुर है स्रोत मधुर है लहरी

कल्पनातीत काल की घटना
हृदय को लगी अचानक रटना
देखकर झरना।

प्रथम वर्षा से इसका झरना
स्मरण ही रहा शैल का कटना
कल्पनातीत काल की घटना

कर गई प्लावित तन मन सारा
एक दिन तब अपांग की धारा
हृदय से झरना—

बह चला, जैसे दृगजल ढरना
प्रणय वन्या ने किया पसारा
कर गई प्लावित तन-मन सारा

प्रेम की पवित्र परछाईं में
लालसा हरित विटप झाईं में
बह चला झरना।

तापमय जीवन शीतल करना
सत्य यह तेरी सुघराई में
प्रेम की पवित्र परछाईं में।

….जयशंकर प्रसाद

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